Wednesday, February 8, 2023
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पहाड़ न्यूज : सत्ता में काबिज होने के लिए कांग्रेस को टिकट वितरण में “विनेबल” और “स्टेबल” प्रत्याशी उतारने होंगे ! पौड़ी जिले में लड़नी होगी अस्तित्व बचाए रखने की लड़ाई !

पहाड न्यूज पॉलिटिकल ब्यूरो: उत्तराखंड में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस 2017 के विधानसभा चुनाव में महज 11 सीटों पर आकर सिमट कर रह गई। इसका अंदाजा कांग्रेस पार्टी के दिग्गजों ने तो क्या खुद 57 सीटें जीतकर राज्य में ऐतिहासिक बहुमत हासिल करने वाली भाजपा के नेताओं ने भी नहीं लगाया था। चुनाव से पहले  बीजेपी को कांग्रेस के जबरदस्त जनाधार वाले नेता और  तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत से निपटने का कोई फार्मूला नहीं मिल रहा था। लिहाजा पूरा चुनाव प्रधानमंत्री मोदी की अगुवाई में लड़ा गया। जिसके चलते  तत्कलीन सीएम हरीश रावत खुद दो सीटों से चुनाव लड़ कर हार गए।

राज्य के मतदाताओं का मिजाज और वर्तमान सियासी मौसम बता रहा है कि अब भी कांग्रेस के लिए उत्तराखंड में 2022 में होने वाले विधानसभा चुनाव में जीत दर्ज कर बहुमत हासिल कर सरकार बनाना बहुत आसान पॉलिटिकल टास्क नहीं है। पार्टी के सामने कई सीटों पर मजबूत जिताऊ और टिकाऊ प्रत्याशी खड़े करने और ढूंढने की चुनौती है।

मसलन राज्य के सबसे बड़े पहाड़ी जनपदों में सुमार पौड़ी जिले की छ: विधानसभा सीटों में से तीन सीटों पर उसके सामने बड़ी मुश्किलें हैं। जिनमें लैंसडाउन, यमकेश्वर और चौबट्टाखाल प्रमुख रूप से शामिल हैं। इन सीटों पर पार्टी के प्रत्याशी बीते विधानसभा चुनावों में जीत दर्ज करने में पूरी तरह नाकाम रहे। ऐसे में क्या इस बार भी कांग्रेस पार्टी के प्रति आस्था रखने वाले निष्ठावान कार्यकर्ताओं को मन मसोड़ कर कमजोर और अचानक चुनाव मैदान में उतारे गए अंजान लोगों के के लिए चुनावी तैयारियों में लगना पड़ेगा ? यहां पार्टी के लिए जिले की इन सीटों पर टिकट बंटवारे में जिताऊ और टिकाऊ प्रत्याशी उतारना बेहद जरूरी है। यदि ऐसा न हुआ, तो इन सभी विधानसभा क्षेत्रों में विपक्षी दल के प्रत्याशी पूर्व की तरह कांग्रेस उम्मीदवारों को रौंद डालेंगे। यहां तक कि मुकाबला टिकट बंटवारे के बाद के शुरुआती चरण में ही इन चुनाव क्षेत्रों में कांग्रेस के मुकाबले बीजेपी की जीत की चर्चाएं उसे बेहद आगे खड़ा करने में मददगार साबित हो जाएगी। जैसा कि अब तक होता आया है।

वहीं अगर बात इस जिले की तीन बाकी विधानसभा सीटों श्रीनगर, पौड़ी और कोटद्वार की हो, तो यहां अभी कांग्रेस के पास पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल पूरी तरह संभावित उम्मीदवार हैं।

वहीं कोटद्वार में पार्टी के वरिष्ठ नेता व पूर्व मंत्री सुरेंद्र सिंह नेगी के अलावा फिलहाल किसी और के नाम को लेकर कोई खास चर्चा नहीं होती दिखाई दे रही है, लिहाजा नेगी ही यहां से कांग्रेस के प्रत्याशी होंगे यह लगभग तय माना जा रहा है।

जबकि जिला मुख्यालय वाली सुरक्षित पौड़ी सीट पर पार्टी के पास कई नेता हैं, जो जिताऊ साबित हो सकते हैं। इस सीट पर कांग्रेस के पास अच्छाखासा कैडर वोट बैंक भी है, हालांकि पिछले विधानसभा चुनाव और बीते लोकसभा चुनाव में यहां बड़ी संख्या में कांग्रेस का परम्परागत वोट बैंक खिसक कर भाजपा के पाले में चला गया। ऐसे में पार्टी को थोड़ा यहां जिताऊ और टिकाऊ प्रत्याशी चुनाव मैदान में उतारने को लेकर इस बार ज्यादा मशक्कत करनी पड़ेगी।

जिले की बाकी तीन सीटों पर कांग्रेस के लिए ‘जिताऊ और टिकाऊ’ उम्मीदवार तलाशना सबसे बड़ी टेंशन है।
कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल के लिए 2022 की चुनावी जंग फतह करने के लिए सबसे बड़ी चुनौती अपने गृह जनपद की लैंसडाउन, यमकेश्वर और चौबट्टाखाल सीटों पर उम्मीदवारों की तलाश करना है। गोदियाल अपने राजनीतिक भ्रमण कार्यक्रमों के दौरान यूं तो साफ कर चुके हैं कि टिकट वितरण में उन्हीं नेताओं को तरजीह दी जाएगी, जो ‘विनेबल’ और ‘स्टेबल’ हों यानी जिताऊ, टिकाऊ और मजबूत।

बता दें कि लैंसडाउन, यमकेश्वर और चौबट्टाखाल के कांग्रेसी लंबे वक्त से उत्तराखंड में दो बार की सरकार बनाकर राज करने के बाद भी सत्ता से बेदखल हैं। जिसके चलते पार्टी के पास इन विधानसभा क्षेत्रों में न मजबूत संगठन बचा है और न ही जनाधार वाले नेता। ऐसे में कांग्रेस के प्रदेश और राष्ट्रीय नेतृत्व को 2022 की चुनावी जंग फतह करने के लिए प्रदेश की ऐसी ही तमाम सीटों पर उम्मीदवारों की तलाश करना बड़ी चुनौती बनता जा रहा है।

मोदी- शाह और योगी का तिलिस्म व मजबूत पार्टी ढांचा, ऐसे में कैसे निपटेगी कांग्रेस भाजपा से ?

 

अब सवाल उठता है कि सूबे की सियासत में मोदी योगी के तिलिस्म में और युवा सीएम पुष्कर सिंह धामी व आरएसएस जैसे मातृत्व संगठन वाली बीजेपी से सियासी मुकाबला और दो-दो हाथ करने के लिए कांग्रेस ‘जिताऊ और टिकाऊ’ उम्मीदवार कहां से लाएगी ? जिससे कि 2022 में उत्तराखंड में उसकी मजबूत बहुमत वाली टिकाऊ सरकार बन सके। पौड़ी जिले की इन तीन सीटों पर कांग्रेस लंबे वक्त से टिकाऊ और जिताऊ प्रत्याशी उतारने में नाकाम रही है। इस बार यह आंकलन लगाना इसलिए और भी अधिक जरूरी हो जाता है।

क्योंकि प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष की बड़ी जिम्मेदारी इसी जिले से गणेश गोदियाल के कंधों पर है, वहीं लोकसभा चुनाव में पार्टी के प्रत्याशी रहे मनीष खंडूड़ी का गृह जनपद भी पौड़ी है। ऐसे में इन दोनों नेताओं के सामने पार्टी को जीत दिलाने और चुनाव में मजबूत जिताऊ और टिकाऊ कैंडिडेट को चुनाव में उतारने को लेकर अच्छी खासी माथापच्ची करनी पड़ेगी।

सभी सीटों पर लड़ेगी कांग्रेस फिलहाल किसी से गठबंधन के आसार नहीं ! 

इतना तय है कि सूबे की सभी 70 सीटों पर कांग्रेस चुनाव लड़ेगी। लेकिन ज्यादा से ज्यादा सीटों पर उसे मजबूती के साथ उतरना होगा। सियासी कयासबाजी पर अगर यकीन किया जाए, तो कांग्रेस कुछ सीटों पर विपक्ष के खेमे से भी तोड़कर कुछ मजबूत और जनाधार वाले विधायकों या नेताओं को आने वाले वक्त में पार्टी में लाकर चुनाव लड़ा सकती है।

विधानसभा चुनाव को लेकर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व हर एक कदम पुख्ता तैयारी के साथ फूंक फूंक कर रख रहा है !

कांग्रेस पार्टी का राष्ट्रीय नेतृत्व उत्तराखंड विधानसभा चुनाव को लेकर हर तरह से फूंक -फूक एहतियातन कदम रख रहा है। जिसमें पार्टी संगठन से लेकर पार्टी के प्रति आस्था रखने वाले मतदाताओं और आम कार्यकर्ताओं की इच्छा व राय को जानने – समझने को महत्व दिया जा रहा है। इसी राय सुमारी और पार्टी के कार्यक्रमों में पूरी सिद्दत से शिरकत करने वाले नेताओं को गंभीरता से लिए जाने की कोशिशें पार्टी के उच्च स्तर पर की जा रही हैं।
लिहाजा कांग्रेस के टिकट पर विधानसभा चुनाव इच्छुक उम्मीदवारों को लेकर विधानसभावार केंद्रीय पर्यवेक्षकों को भेजा गया है। इस लिहाज से ही टिकट बंटवारे और उम्मीदवारी पाने को लेकर शीर्ष नेतृत्व राज्य में स्क्रीनिंग कमेटी का गठन कर चुका है।

 

क्या है पौड़ी जनपद का मौजूदा सियासी मिजाज ?

पौड़ी जिले की छः सीटों में से 2017 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को एक भी सीट नहीं मिली। जबकि लैंसडाउन और चौबट्टाखाल में कांग्रेस के टिकट पर उतारे गए उम्मीदवार दो बार से लगातर हार रहे हैं। वहीं यमकेश्वर में तो कई बार से अब तक पार्टी अपना खाता नहीं खोल पाई।

बता दें कि कांग्रेस के कई खांटी नेता इस जिले से पार्टी से बगावत कर पूर्व में ही बीजेपी के साथ हो गए। जिससे पार्टी इस जिले में और कमजोर हो गई। पार्टी के कुछ नेताओं की मनमानी के चलते यहां मजबूत की अपेक्षा कमजोर प्रत्याशियों को चुनाव मैदान में उतारने का खामियाजा भी कांग्रेस कई सीटों पर उठाती रही।

अगर ऐसा ही चलन पार्टी में बना रहा, तो आखिर कैसे बिना मजबूत उम्मीदवारों के बीजेपी के सियासत भरे उग्र राष्ट्रवाद और आक्रामक हिंदुत्व और मोदी योगी की इमेज की गहरी छाप का मुकाबला कांग्रेस यहां कर पाएगी। इतना ही नहीं यहां उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के प्रभाव की सियासी तासीर का असर भी आग में घी डालने का काम अलग से करेगा।

 पौड़ी से योगी आदित्यनाथ का होना भी बड़ा सियासी कारक है ! 

वहीं, जैसे जैसे चुनाव का मौसम करीब आएगा, वैसे ही 2022 विधानसभा चुनाव की सरगर्मी के साथ आयाराम और गयाराम का दौर भी तेजी से शुरू होता दिखेगा। सूबे में युवा सीएम पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में बीजेपी सत्तासीन है। उसके पास मजबूत पार्टी संगठन के अलावा संघ और उसके तमाम अनुषांगिक संगठनों की विभिन्न वर्गों में घर- घर, गांव- गांव मजबूत पकड़ होने के करण दल बदल करने वाले नेताओं का उससे तेजी से जुड़ाव व राजनीतिक ठिकाना बनने का सिलसिला जारी है।


ऐसे में कांग्रेस के दिल्ली में बैठे राष्ट्रीय और प्रदेश के शीर्ष नेताओं को हर एक सीट पर बहुत सोच समझ कर मजबूत जिताऊ और टिकाऊ उम्मीदवारों को चुनाव मैदान में उतारना होगा। क्योंकि विधानसभा चुनाव में जब कांग्रेस बीजेपी के बीच सीधी लड़ाई होगी, तो यहां मोदी , अमितशाह के साथ ही योगी आदित्यनाथ को चुनाव प्रचार में उतारा जाएगा। योगी का मूल रूप से उत्तराखंड के पौड़ी जिले से होना भी बीजेपी को लाभ पहुंचा सकता है। इसीलिए कांग्रेस नेताओं को पौड़ी जिले की इन तमाम रेखांकित सीटों के अलावा प्रदेश भर में निजी स्तर पर जनाधार और हर तरह से मजबूत टिकाऊ और जिताऊ युवा नेताओं को टिकट देकर चुनाव लड़ने की दिशा में आगे बढ़ना होगा। क्योंकि भाजपा की आक्रामक चुनाव प्रचार शैली उसके विरोधियों और मतदाताओं को भ्रमित करने और येन के प्रकारेण अपने पक्ष में मतदान करने को मजबूर कर देती है। इसलिए कांग्रेस को यदि उत्तराखण्ड में सत्ता में आना है, तो हर एक सीट पर भाजपा से निजी स्तर पर मुकाबला करने में सक्षम लोगों को चुनाव मैदान में उतारना होगा। वरना महज पार्टी कैडर के वोटों के सहारे चुनावी बैतरणी पार करने की मनसा पाले नेताओं के सहारे कांग्रेस सत्ता में काबिज हो पाएगी बहरहाल इसके आसार मौजूदा वक्त में तो दूर- दूर तक कहीं नजर नहीं आ रहे।

सत्ता का वनवास झेल रहे हैं इन विधानसभा क्षेत्रों के कांग्रेसी !

राजनीतिक विशेषज्ञ और पौड़ी जिले की सियासत पर गहरी पकड़ रखने वाले कई जानकार मानते हैं कि यमकेश्वर, लैंसडाउन, चौबट्टाखाल और पौड़ी विधानसभा क्षेत्र में कांग्रेस को नए और मजबूत लोगों को चुनाव मैदान में उतारना पड़ेगा। क्योंकि यहां पार्टी संगठन और कार्यकर्ता लंबे वक्त से सत्ता का वनवास झेल रहे हैं। जिससे पार्टी कैडर लगातार कमजोर हो रहा है। इसका असर पंचायत चुनावों से लेकर लोकसभा चुनाव पर नकारात्मक तौर पर दर्ज किया गया है। जबकि कांग्रेस की मुख्य विपक्षी भाजपा का वोट बैंक इन सीटों पर हर चुनाव में बढ़ रहा है। जो पूरी मजबूती के साथ हर चुनाव में यहां जीत दर्ज करने में सफल रही है। यहां कांग्रेस से चुनाव लड़ चुके उम्मीदवार अभी तक कार्यकर्ताओं तक में यह विश्वास पैदा नहीं कर सके कि वो बीजेपी को चुनाव हरा सकने में किसी भी तरह से सक्षम हैं। ऐसे में यहां पार्टी कार्यकर्ता बिना ऊर्जावान और जुझारू और मजूबत नेता के कांग्रेस के लिए पूरी इच्छा शक्ति के साथ वोट मांगने मतदाताओं के बीच आखिर कैसे पहुंचेगा ? इसके बाद 2024 में लोकसभा चुनाव भी होने हैं। जिसमें विधानसभा चुनाव की जीत के बिना बीजेपी का सामना करना यहां कांग्रेस के लिए आसान नहीं होगा। ऐसे में यह बेहद गौर करने वाला राजनीतिक तथ्य है कि किसी भी सियासी पार्टी का  कार्यकर्ता चुनाव जीतने के मकसद से मतदाताओं के बीच जाता है। सिर्फ इसलिए कि उसकी पार्टी का उम्मीदवार जीते और सरकार और विधानसभा में पहुंचकर उसके क्षेत्र के विकास के लिए आवाज उठाए या सरकार में भागीदार बने। यही कारण है कि वह पार्टी की जीत के लिए जी जान लगाकर मेहनत करता है, न कि हारने के लिए।

कार्यकर्ताओं का आत्मविश्वास बढ़ाने वाले नेताओं को लाना होगा आगे !

राजनीतिक लिहाज से उत्तराखण्ड में सरकार बनाने के लिए कांग्रेस को पार्टी से ही हर सीट पर ऐसे मजबूत नेता तलाश कर चुनाव मैदान में उतारने होंगे, जो कार्यकर्ताओं को व्यक्तिगत स्तर पर जीत का भरोसा दिलाने का आभास करा सके और उनका आत्मविश्वास बढ़ाने में मददगार बने।

यह विधानसभा सीट बनी हुई है सियासी चर्चाओं में सबसे हॉट 

पौड़ी जिले की चौबट्टाखाल विधानसभा क्षेत्र इस वक़्त सबसे हॉट विधानसभा सीट बनी हुई है। यहां से इस वक़्त बीजेपी नेता सतपाल महाराज विधायक हैं। वे उत्तराखण्ड सरकार में पर्यटन , लोनिवि सहित कई महत्वपूर्ण विभागों के कैबिनेट मंत्री हैं।

अब बात तथ्य की आखिर इस सीट के हॉट होने की चर्चा क्यों हो रही है? सवाल लाजमी है। जी हां ! इसकी बड़ी सियासी वजह है, यहां पूर्व में लगातार दो बार कांग्रेस से चुनाव लड़ चुके एआईसीसी सदस्य राजपाल सिंह व निर्दलीय के तौर पर चुनावी समर में उतरे कांग्रेस के प्रदेश सचिव कविंद्र इस्टवाल अपना भाग्य आजमा चुके हैं। लेकिन इन दोनों के अलावा इस बार पूर्व प्रमुख पोखड़ा सुरेंद्र सिंह रावत यहां से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ने की इच्छा जता रहे हैं। लेकिन इस विधानसभा क्षेत्र में भारीभरकम  कैबिनेट मंत्री सतपाल महाराज का दशकों पुराना सियासी और आध्यात्मिक प्रभाव किसी छिपा नहीं है। ऐसे में कौन उन्हें चुनौती देने में सक्षम हो सकता है ? यही चर्चा इस सीट को हॉट और चर्चा का केंद्र बना रही है। यहां एक नाम पिछले लोकसभा चुनाव के बाद से सबसे ज्यादा सुर्खियों में है। वह हैं जिला मुख्यालय पौड़ी के ब्लॉक प्रमुख रह चुके और पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष केसर सिंह नेगी। जोकि वर्तमान में प्रदेश कांग्रेस के उपाध्यक्ष हैं, इसके अलावा पार्टी ने उनके कंधों पर विधानसभा चुनाव प्रचार समिति की विशेष टीम में प्रमुख सदस्य की जिम्मेदारी भी डाली है। वे पार्टी के शीर्ष नेताओं और चुनावी रणनीति तय करने वाले नेताओं की कोर टीम में शामिल हैं। उनका पौड़ी जिले में अच्छा खासा प्रभाव है। नेगी चौबट्टाखाल विधानसभा क्षेत्र में काफी लंबे समय से सक्रिय हैं। ग्रामीण इलाकों में उनके पास युवाओं की अच्छी खासी टीम है। लगातार पार्टी के कार्यक्रमों में शिरकत कर रहे हैं।

चुनाव प्रबंधन में हर तरह से सक्षम हैं। इसलिए पार्टी ने उनके गृह क्षेत्र की पौड़ी विधानसभा सीट को लेकर भी उनसे राय सुमारी की है। पार्टी उम्मीदवार को वहां चुनाव लड़ाने में भी उनकी भूमिका तय मानी जा रही है। चौबट्टाखाल सीट पर उन्होंने अपनी दावेदारी के संकेत बहुत पहले ही दे दिए थे। जबकि पार्टी स्तर पर भी वे अपना दावा पेश कर चुके हैं। क्षेत्र भ्रमण, कार्यकर्ताओं से मुलाकात और आम जन के बीच पहुंच का सिलसिला उन्होंने काफी पहले शुरू कर दिया था। ऐसे ही कई कारण हैं, जिनसे इस सीट पर महाराज को चुनौती देने को लेकर कांग्रेस उम्मीदवार के तौर पर उनकी सियासी चर्चा हो रही है। पार्टी के सभी शीर्ष नेताओं से लेकर जनता और संगठन के लोगों से उनके संबंध काफी अच्छे बताए जाते हैं। इतना ही नहीं विपक्षी दल भाजपा में उनके पुराने रिश्ते होने के चलते कई लोग स्थानीय स्तर पर उनके संपर्क में हैं। ऐसा कई बार देखा भी गया है और उनके करीबी दावा भी करते हैं।


अगर ऐसा होता है, तो चौबट्टाखाल में भाजपा कांग्रेस के बीच मुकाबला रोचक और कंट्रास्ट हो सकता है। जीत के लिए सतपाल महाराज को अपनी कई गुना ऊर्जा और संसाधन झोंकने पड़ेंगे। लेकिन बावजूद इस सबके कांग्रेस किसी मुगालते में न रहे कि उसके लिए चौबट्टाखाल का चुनावी रण इससे बेहद आसान हो जाएगा। हां दोनों पार्टियों के इन दोनों संभावित उम्मीदवारों के बीच अगर चुनाव होता है, तो  मुकाबला कड़ा और कांटे का होना तय है। जिसका परिणाम कुछ भी हो सकता है।

यमकेश्वर में क्या चल रहा है कांग्रेस के अंदर ?

अब बात यमकेश्वर विधानसभा सीट की करें तो, यहां वर्तमान में पर्व मुख्यमंत्री बीसी खंडूड़ी की बेटी ऋतु भूषण खंडूड़ी भाजपा से विधायक हैं। उनसे पहले भी लंबे वक्त से इस क्षेत्र में भाजपा चुनाव जीतती रही है। कांग्रेस इस सीट पर कई बार उम्मीदवार बदलकर देख चुकी है, लेकिन उसे यहां भाजपा से हर बार मात ही खानी पड़ी। कारण साफ हैं कि पार्टी के लोग ही बागी बनकर चुनाव मैदान में उतरकर अपनों का खेल बिगाड़ने में लगे रहे।

पिछले विधानसभा चुनाव में अचानक कांग्रेस ने बीजेपी के कोटद्वार से विधायक रहे शैलेन्द्र रावत को टिकट दे कर चुनाव मैदान में उतार दिया। अचानक कार्यकर्ताओं को ऐसे व्यक्ति के लिए लगना पड़ा जिसका पार्टी से कभी कोई सरोकार नहीं रहा। लेकिन कोटद्वार से बड़ा नाम और विधायक रहने के कारण कांग्रेस ने उनपर दाव खेलना जरूरी समझा। लेकिन बीजेपी और कथित मोदी लहर में उन्हें हार का मुंह देखना पड़ा।

लेकिन इस बार इस विधानसभा क्षेत्र में  द्वारीखाल क्षेत्र पंचायत प्रमुख महेंद्र सिंह राणा का नाम बड़ी तेजी से कांग्रेस से चुनाव लड़ने को लेकर सुर्खियों में है। वे इसी मकसद से द्वारीखाल में क्षेत्र पंचायत प्रमुख के रूप में अपनी सियासी जमीन तैयार करने के लिए 2019 के त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में उतरे और उन्हें यहां पूरी कामयाबी मिली। अब उनका लक्ष्य कांग्रेस के टिकट पर विधानसभा चुनाव लड़ने का है।

तब से लेकर वे इस विधानसभा क्षेत्र में काफी सक्रिय हैं। हालांकि पूर्व विधायक शैलेन्द्र सिंह रावत को पार्टी एक फिर मौका दे सकती है।

वहीं पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष सरोजिनी कैंत्यूरा भी यहां टिकट की दावेदारी पेश करेंगी, वे लगातार यहां अपनी बहू के साथ कई बार राजनीतिक कार्यक्रमों में देखी गई है। पार्टी के टिकट पर वे पहले भी यहां से चुनाव लड़ चुकी हैं। अब इस बार पार्टी किसे अपना उम्मीदवार बनाएगी, यहां कयासों का बाजार गर्म है।

लेकिन महेंद्र राणा को लेकर लोगों के बीच चर्चा जरूर हो रही है। यदि यहां कोई बड़ा सियासी बदलाव हुआ तो उनके हाथ टिकट की लॉटरी लग सकती है।

लैंसडाउन में क्या है कांग्रेस में माहौल ? 

अब बात अगर लैंसडाउन विधानसभा क्षेत्र की हो, तो यहां बीते दो चुनाव से बीजेपी का उम्मीदवार जीतने में सफल रहा है। उससे पहले भी यहां से पूर्व सीएम बीसी खण्डूरी बीजेपी से उप चुनाव जीत कर इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। इससे पहले भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के टिकट पर पूर्व सैन्य अधिकारी लेफ्टिनेंट जनरल टीपीएस रावत दो बार विधायक और राज्य की पहली निर्वाचित एनडी तिवारी सरकार में ताकतवर कैबिनेट मंत्री रह चुके हैं। कांग्रेस एक उपचुनाव और दो विधानसभा चुनावों से यहां लगातार हार रही है। इससे यहां पार्टी का संगठनात्मक ढांचा कमजोर होता जा रहा है। अभी भी यहां चुनाव लड़ने को लेकर पार्टी में कोई बड़ा प्रभावशाली और लोकप्रिय नाम शामिल नहीं है। हालांकि कांग्रेस से टिकट मिलने की आस लगाए और लगातर ग्रामीण स्तर पर सक्रिय पूर्व मंत्री और टीपीएस रावत की सियासी ब्रिगेड के अहम सदस्य रघुबीर सिंह बिष्ट ने अपने पक्ष में माहौल बना रखा है।

इनके अलावा पूर्व में दो बार से पार्टी की प्रत्याशी रही ज्योति रौतेला, नैनीडांडा की पूर्व ब्लॉक प्रमुख रश्मि पटवाल, रिखणीखाल की पूर्व ब्लॉक प्रमुख पिंकी नेगी और महिला कांग्रेस कोटद्वार की जिलाध्यक्ष रही रंजना रावत के नाम टिकट की दावेदारी करने वालों में शामिल हैं।

जबकि कयास ये भी हैं कि इस सीट पर किसी बड़े और पुराने प्रभावशाली रहे कांग्रेसी विधायक का नाम पार्टी कार्यकर्ताओं और लोगों को चौंका सकता है। हालांकि यह सिर्फ अभी सियासी अटकलबाजी है।

पौड़ी जिले में अपना खोया हुआ अस्तित्व बचाने के लिए कांग्रेस को बड़ी मशक्कत करनी होगी! 

बहरहाल जो भी हो कांग्रेस को पौड़ी जिले में अपना पुराना सियासी अस्तित्व बचाने के लिए मजबूत जनाधार, टिकाऊ और जिताऊ प्रत्यशियों को चुनाव मैदान में उतारना ही होगा, नहीं तो चुनावी बैतरणी और मोदी – योगी युग की इस वर्तमान आक्रामक राजनीति में उसे जीत और सत्ता का स्वाद चखने के लाले पड़ सकते हैं।

 

 

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